Sant kabir ke dohe with hindi meaning


कबीर के दोहे  हिंदी अर्थ सहित |sant kabir ke dohe with meaning in hindi

दोस्तों स्वागत है  आपका हमारी वेबसाइट पर आज में आपको  sant kabir ke dohe in hindi इस आर्टिकल के बारे में बात करने वाला हु.आप इसे जरूर पढ़े.
कबीर दास जी हिंदी साहित्य के महान पंडित व्यक्तित्व होने के साथ-साथ एक महान संत, एक महान विचारक और समाज सुधारक भी थे। कबीर दास जी ने अपने सकारात्मक विचारों से करीब 800 दोहों में जीवन के कई पक्षों पर अपने अनुभवों का जीवंत वर्णन किया है।




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संत कबीर दास की जानकारी  – 40 best famous and inspiring dohe of Sant Kabir das with meaning in hindi

नाम –  संत कबीरदास (Kabir Das)
जन्म – 1398
जन्म स्थान – लहरतारा ताल, काशी
कर्म भूमि – काशी, बनारस
कार्य क्षेत्र – समाज सुधारक, कवि, सूत काटकर कपड़ा बनाना
मुख्य रचनाएं – साखी, सबद, रमैनी

पिता का नाम – नीरू
पत्नी का नाम – लोई
मृत्यु – 1518
मृत्यु स्थान – मगहर, उत्तर प्रदेश
माता का नाम – नीमा
पुत्र का नाम – कमाल
पुत्री का नाम – कमाली
भाषा – अवधी, सधुक्कड़ी, पंचमेल खिचड़ी
शिक्षा – निरक्षर
नागरिकता – भारतीय

Sant Kabir ke dohe हिंदी अर्थ सहित |  sant Kabir ke dohe with  meaning in Hindi language


1
बिन रखवाले बाहिरा चिड़िये खाया खेत
आधा परधा ऊबरै, चेती सकै तो चेत
अर्थ :- रखवाले के बिना बाहर से चिड़ियों ने खेत खा लिया. कुछ खेत अब भी बचा है यदि सावधान हो सकते हो तो हो जाओ उसे बचा लो ! जीवन में असावधानी के कारण इंसान बहुत कुछ गँवा देता है उसे खबर भी नहीं लगती नुक्सान हो चुका होता है यदि हम सावधानी बरतें तो कितने नुक्सान से बच सकते हैं ! इसलिए जागरूक होना है हर इंसान को -( जैसे पराली जलाने की सावधानी बरतते तो दिल्ली में भयंकर वायु प्रदूषण से बचते पर अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत
2
सातों सबद जू बाजते घरि घरि होते राग
ते मंदिर खाली परे बैसन लागे काग
अर्थ :- कबीर कहते हैं कि जिन घरों में सप्त स्वर गूंजते थे, पल पल उत्सव मनाए जाते थे, वे घर भी अब खाली पड़े हैं उनपर कौए बैठने लगे हैं. हमेशा एक सा समय तो नहीं रहता ! जहां खुशियाँ थी वहां गम छा जाता है जहां हर्ष था वहां विषाद डेरा डाल सकता है यह इस संसार में होता है !.
3
कबीर सीप समंद की, रटे पियास पियास
समुदहि तिनका करि गिने, स्वाति बूँद की आस
अर्थ :- कबीर कहते हैं कि समुद्र की सीपी प्यास प्यास रटती रहती है. स्वाति नक्षत्र की बूँद की आशा लिए हुए समुद्र की अपार जलराशि को तिनके के बराबर समझती है. हमारे मन में जो पाने की ललक है जिसे पाने की लगन है, उसके बिना सब निस्सार है.
4
लंबा मारग दूरि घर, बिकट पंथ बहु मार।
कहौ संतों क्यूं पाइए, दुर्लभ हरि दीदार॥
अर्थ :- घर दूर है मार्ग लंबा है रास्ता भयंकर है और उसमें अनेक पातक चोर ठग हैं. हे सज्जनों ! कहो , भगवान् का दुर्लभ दर्शन कैसे प्राप्त हो?संसार में जीवन कठिन हैअनेक बाधाएं हैं विपत्तियां हैंउनमें पड़कर हम भरमाए रहते हैंबहुत से आकर्षण हमें अपनी ओर खींचते रहते हैंहम अपना लक्ष्य भूलते रहते हैंअपनी पूंजी गंवाते रहते हैं


Kabir Dohe

4
इस तन का दीवा करों, बाती मेल्यूं जीव।
लोही सींचौं तेल ज्यूं, कब मुख देखों पीव॥
अर्थ :- इस शरीर को दीपक बना लूं, उसमें प्राणों की बत्ती डालूँ और रक्त से तेल की तरह सींचूंइस तरह दीपक जला कर मैं अपने प्रिय के मुख का दर्शन कब कर पाऊंगा? ईश्वर से लौ लगाना उसे पाने की चाह करना उसकी भक्ति में तन-मन को लगाना एक साधना है तपस्या हैजिसे कोई कोई विरला ही कर पाता हैKabir das ke dohe



6
नैना अंतर आव तू, ज्यूं हौं नैन झंपेउ।
ना हौं देखूं और को तुझ देखन देऊँ॥
अर्थ :- हे प्रिय ! ( प्रभु ) तुम इन दो नेत्रों की राह से मेरे भीतर जाओ और फिर मैं अपने इन नेत्रों को बंद कर लूं ! फिर तो मैं किसी दूसरे को देखूं और ही किसी और को तुम्हें देखने दूं !



6
कबीर रेख सिन्दूर की काजल दिया जाई। नैनूं रमैया रमि रहा दूजा कहाँ समाई
अर्थ :- कबीर कहते हैं कि जहां सिन्दूर की रेखा हैवहां काजल नहीं दिया जा सकता. जब नेत्रों में राम विराज रहे हैं तो वहां कोई अन्य कैसे निवास कर सकता है ?

7
मैं मैं बड़ी बलाय है, सकै तो निकसी भागि। 
कब लग राखौं हे सखी, रूई लपेटी आगि॥
अर्थ :- अहंकार बहुत बुरी वस्तु है. हो सके तो इससे निकल कर भाग जाओ. मित्र, रूई में लिपटी इस अग्नि अहंकार को मैं कब तक अपने पास रखूँ?



8
कबीर बादल प्रेम का, हम पर बरसा आई  
अंतरि भीगी आतमा, हरी भई बनराई
अर्थ :- कबीर कहते हैं प्रेम का बादल मेरे ऊपर आकर बरस पडा जिससे अंतरात्मा तक भीग गई, आस पास पूरा परिवेश हरा-भरा हो गया खुश हाल हो गया यह प्रेम का अपूर्व प्रभाव है ! हम इसी प्रेम में क्यों नहीं जीते ! 

9
जिहि घट प्रेम प्रीति रस, पुनि रसना नहीं नाम।
ते नर या संसार में , उपजी भए बेकाम
अर्थ :- जिनके ह्रदय में तो प्रीति है और प्रेम का स्वाद, जिनकी जिह्वा पर राम का नाम नहीं रहता वे मनुष्य इस संसार में उत्पन्न हो कर भी व्यर्थ हैं. प्रेम जीवन की सार्थकता है. प्रेम रस में डूबे रहना जीवन का सार है.

10
जांमण मरण बिचारि करि कूड़े काम निबारि
जिनि पंथूं तुझ चालणा सोई पंथ संवारि
अर्थ :- जन्म और मरण का विचार करके , बुरे कर्मों को छोड़ दे. जिस मार्ग पर तुझे चलना है उसी मार्ग का स्मरण कर उसे ही याद रख उसे ही संवार सुन्दर बना  kabir dohe
11.
कबीर कहा गरबियौ, ऊंचे देखि अवास  
काल्हि परयौ भू लेटना ऊपरि जामे घास॥
अर्थ :- कबीर कहते है कि ऊंचे भवनों को देख कर क्या गर्व करते हो ? कल या परसों ये ऊंचाइयां और (आप भी) धरती पर लेट जाएंगे ध्वस्त हो जाएंगे और ऊपर से घास उगने लगेगी ! वीरान सुनसान हो जाएगा जो अभी हंसता खिलखिलाता घर आँगन है ! इसलिए कभी गर्व करना चाहिए.
12.
मान, महातम, प्रेम रस, गरवा तण गुण नेह।
सबही अहला गया, जबहीं कह्या कुछ देह॥
अर्थ :- मान, महत्त्व, प्रेम रस, गौरव गुण तथा स्नेह सब बाढ़ में बह जाते हैं जब किसी मनुष्य से कुछ देने के लिए कहा जाता है.





13.
जाता है सो जाण दे, तेरी दसा जाइ। 
खेवटिया की नांव ज्यूं, घने मिलेंगे आइ॥
अर्थ :- जो जाता है उसे जाने दो. तुम अपनी स्थिति को, दशा को जाने दो. यदि तुम अपने स्वरूप में बने रहे तो केवट की नाव की तरह अनेक व्यक्ति आकर तुमसे मिलेंगे.





14.
मानुष जन्म दुलभ है, देह बारम्बार।
तरवर थे फल झड़ी पड्या,बहुरि लागे डारि॥

अर्थ :- मानव जन्म पाना कठिन है. यह शरीर बार-बार नहीं मिलता. जो फल वृक्ष से नीचे गिर पड़ता है वह पुन: उसकी डाल पर नहीं लगता .



Sant Kabir Ke Dohe

15.
इक दिन ऐसा होइगा, सब सूं पड़े बिछोह। 
राजा राणा छत्रपति, सावधान किन होय॥
अर्थ :- : एक दिन ऐसा जरूर आएगा जब सबसे बिछुड़ना पडेगा. हे राजाओं ! हे छत्रपतियों ! तुम अभी से सावधान क्यों नहीं हो जाते !(hindi kabir das ke dohe)



16.
कबीर प्रेम चक्खिया,चक्खि लिया साव।
सूने घर का पाहुना, ज्यूं आया त्यूं जाव॥
अर्थ :- कबीर कहते हैं कि जिस व्यक्ति ने प्रेम को चखा नहीं, और चख कर स्वाद नहीं लिया, वह उसअतिथि के समान है जो सूने, निर्जन घर में जैसा आता है, वैसा ही चला भी जाता है, कुछ प्राप्त नहीं कर पाता.

17.
हरिया जांणे रूखड़ा, उस पाणी का नेह।
सूका काठ जानई, कबहूँ बरसा मेंह॥

अर्थ :- पानी के स्नेह को हरा वृक्ष ही जानता है.सूखा काठ लकड़ी क्या जाने कि कब पानी बरसा? अर्थात सहृदय ही प्रेम भाव को समझता है. निर्मम मन इस भावना को क्या जाने ?





18.
झिरमिर- झिरमिर बरसिया, पाहन ऊपर मेंह। 
माटी गलि सैजल भई, पांहन बोही तेह॥

अर्थ :- बादल पत्थर के ऊपर झिरमिर करके बरसने लगे. इससे मिट्टी तो भीग कर सजल हो गई किन्तु पत्थर वैसा का वैसा बना रहा.





19.
कहत सुनत सब दिन गए, उरझी सुरझ्या मन। 
कहि कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन॥

अर्थ :- कहते सुनते सब दिन बीत गए, पर यह मन उलझ कर सुलझ पाया ! कबीर कहते हैं कि यह मन अभी भी होश में नहीं आता. आज भी इसकी अवस्था पहले दिन के ही समान है.

20.
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।


अर्थ :- मन में धीरज रखने से सब कुछ होता है। अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े पानी से सींचने लगे                   तब भी फल तो ऋतु आने पर ही लगेगा !






21.
तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।


अर्थ :- कबीर कहते हैं कि एक छोटे से तिनके की भी कभी निंदा करो जो तुम्हारे पांवों के नीचे दब जाता                    है। यदि कभी वह तिनका उड़कर आँख में गिरे तो कितनी गहरी पीड़ा होती है ! Sant kabir dohe





22.
जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही
सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही ।।

अर्थ :- जब मैं अपने अहंकार में डूबा था तब प्रभु को देख पाता था लेकिन जब गुरु ने ज्ञान का दीपक मेरे भीतर प्रकाशित किया तब अज्ञान का सब अन्धकार मिट गया ज्ञान की ज्योति से अहंकार जाता रहा और ज्ञान के आलोक में प्रभु को पाया


23.
माया मुई मन मुआ, मरी मरी गया सरीर। 
आसा त्रिसना मुई, यों कही गए कबीर
अर्थ :- कबीर कहते हैं कि संसार में रहते हुए माया मरती है मन। शरीर जाने कितनी बार मर चुका पर मनुष्य की आशा और तृष्णा कभी नहीं मरती, कबीर ऐसा कई बार कह चुके हैं।




24.
मन हीं मनोरथ छांड़ी दे, तेरा किया होई। 
पानी में घिव निकसे, तो रूखा खाए कोई।

अर्थ :- मनुष्य मात्र को समझाते हुए कबीर कहते हैं कि मन की इच्छाएं छोड़ दो , उन्हें तुम अपने बूते पर पूर्ण नहीं कर सकते। यदि पानी से घी निकल आए, तो रूखी रोटी कोई खाएगा।
25.
तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई।
सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ।

अर्थ :- शरीर में भगवे वस्त्र धारण करना सरल है, पर मन को योगी बनाना बिरले ही व्यक्तियों का काम है य़दि मन योगी हो जाए तो सारी सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं।
26.
जो उग्या सो अन्तबै, फूल्या सो कुमलाहीं। 
जो चिनिया सो ढही पड़े, जो आया सो जाहीं।

अर्थ :- इस संसार का नियम यही है कि जो उदय हुआ है,वह अस्त होगा। जो विकसित हुआ है वह मुरझा जाएगा। जो चिना गया है वह गिर पड़ेगा और जो आया है वह जाएगा।






27.
कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहां उडी जाइ। 
जो जैसी संगती कर, सो तैसा ही फल पाइ।

अर्थ :- कबीर कहते हैं कि संसारी व्यक्ति का शरीर पक्षी बन गया है और जहां उसका मन होता है, शरीर उड़कर वहीं पहुँच जाता है। सच है कि जो जैसा साथ करता है, वह वैसा ही फल पाता है।





28.
कबीर सो धन संचे, जो आगे को होय। 
सीस चढ़ाए पोटली, ले जात देख्यो कोय।

अर्थ :- कबीर कहते हैं कि उस धन को इकट्ठा करो जो भविष्य में काम आए। सर पर धन की गठरी बाँध कर ले जाते तो किसी को नहीं देखा
29.
कबीर सुता क्या करे, जागी जपे मुरारी  
एक दिन तू भी सोवेगा, लम्बे पाँव पसारी ।।

अर्थ :- कबीर कहते हैं अज्ञान की नींद में सोए क्यों रहते हो? ज्ञान की जागृति को हासिल कर प्रभु का नाम लो।सजग होकर प्रभु का ध्यान करो।वह दिन दूर नहीं जब तुम्हें गहन निद्रा में सो ही जाना है जब तक जाग सकते हो जागते क्यों नहीं? प्रभु का नाम स्मरण क्यों नहीं करते ?(sant kabir ke dohe in hindi)

30.
कबीर थोड़ा जीवना, मांड़े बहुत मंड़ाण। 
कबीर थोड़ा जीवना, मांड़े बहुत मंड़ाण॥

अर्थ :- बादल पत्थर के ऊपर झिरमिर करके बरसने लगे. इससे मिट्टी तो भीग कर सजल हो गई किन्तु पत्थर वैसा का वैसा बना रहा.
31.
लूट सके तो लूट ले,राम नाम की लूट  
पाछे फिर पछ्ताओगे,प्राण जाहि जब छूट


अर्थ :- कबीर दस जी कहते हैं कि अभी राम नाम की लूट मची है , अभी तुम भगवान् का जितना नाम लेना                  चाहो ले लो नहीं तो समय निकल जाने पर, अर्थात मर जाने के बाद पछताओगे कि मैंने तब राम                           भगवान्  की पूजा क्यों नहीं की

32
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब  
पल में प्रलय होएगी,बहुरि करेगा कब  


अर्थ :- कबीर दास जी समय की महत्ता बताते हुए कहते हैं कि जो कल करना है उसे आज करो और और                     जोआज करना है उसे अभी करो , कुछ ही समय में जीवन ख़त्म हो जायेगा फिर तुम क्या कर पाओगे !



33.
साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय
मैं भी भूखा रहूँ, साधु ना भूखा जाय  


अर्थ :- कबीर दस जी कहते हैं कि परमात्मा तुम मुझे इतना दो कि जिसमे बस मेरा गुजरा चल जाये , मैं खुद                  भी अपना पेट पाल सकूँ और आने वाले मेहमानो को भी भोजन करा सकूँ। (kabir das ke dohe in hindi)


34.
तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय, 
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।

अर्थ :- कबीर कहते हैं कि एक छोटे से तिनके की भी कभी निंदा करो जो तुम्हारे पांवों के नीचे दब जाता है। यदि कभी वह तिनका उड़कर आँख में गिरे तो कितनी गहरी पीड़ा होती है !

35
बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।



अर्थ :- यदि कोई सही तरीके से बोलना जानता है तो उसे पता है कि वाणी एक अमूल्य रत्न है। इसलिए वह  ह्रदय के तराजू में तोलकर ही उसे मुंह से बाहर आने देता है।(dohe of kabir in hindi)

36.
माला फेरत जुग भया, फिरा मन का फेर,
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।


अर्थ :- कोई व्यक्ति लम्बे समय तक हाथ में लेकर मोती की माला तो घुमाता है, पर उसके मन का भाव नहीं                  बदलता, उसके मन की हलचल शांत नहीं होती। कबीर की ऐसे व्यक्ति को सलाह है कि हाथ की इस                   माला को फेरना छोड़ कर मन के मोतियों को बदलो या फेरो।
37.
हाड जले लकड़ी जले जले जलावन हार  
कौतिकहारा भी जले कासों करूं पुकार


अर्थ :- दाह क्रिया में हड्डियां जलती हैं उन्हें जलाने वाली लकड़ी जलती है उनमें आग लगाने वाला भी एक       दिन जल जाता है. समय आने पर उस दृश्य को देखने वाला दर्शक भी जल जाता है. जब सब का अंत यही हो तो पनी पुकार किसको दू? किससे गुहार करूं विनती या कोई आग्रह करूं? सभी तो एक नियति से बंधे हैं ! सभी का अंत एक है !
38
दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करै कोय।
जो सुख में सुमिरन करे दुःख काहे को होय  


अर्थ :- कबीर दास जी कहते हैं कि दुःख के समय सभी भगवान् को याद करते हैं पर सुख में कोई नहीं                          करता। यदि सुख में भी भगवान् को याद किया जाए तो दुःख हो ही क्यों !






39.
अति का भला बोलना, अति की भली चूप, 
अति का भला बरसना, अति की भली धूप।


अर्थ :-  तो अधिक बोलना अच्छा है, ही जरूरत से ज्यादा चुप रहना ही ठीक है। जैसे बहुत अधिक वर्षा                   भी अच्छी नहीं और बहुत अधिक धूप भी अच्छी नहीं है।
40.
हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना,
आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए, मरम कोउ जाना।

अर्थ :- कबीर कहते हैं कि हिन्दू राम के भक्त हैं और तुर्क (मुस्लिम) को रहमान प्यारा है। इसी बात पर दोनों लड़-लड़ कर मौत के मुंह में जा पहुंचे, तब भी दोनों में से कोई सच को जान पाया।

42.
कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर, 
ना काहू से दोस्ती, काहू से बैर।
अर्थ :- इस संसार में आकर कबीर अपने जीवन में बस यही चाहते हैं कि सबका भला हो और संसार में यदि किसी से दोस्ती नहीं तो दुश्मनी भी हो !



43.
निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय, 
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।
अर्थ :- जो हमारी निंदा करता है, उसे अपने अधिकाधिक पास ही रखना चाहिए। वह तो बिना साबुन और पानी के हमारी कमियां बता कर हमारे स्वभाव को साफ़ करता है।







44
पढ़े गुनै सीखै सुनै मिटी संसै सूल।
कहै कबीर कासों कहूं ये ही दुःख का मूल


अर्थ :- बहुत सी पुस्तकों को पढ़ा गुना सुना सीखा पर फिर भी मन में गड़ा संशय का काँटा निकला कबीर                  कहते हैं कि किसे समझा कर यह कहूं कि यही तो सब दुखों की जड़ है ऐसे पठन मनन से क्या                        लाभ जो मन का संशय मिटा सके?


45.
मन मैला तन ऊजला बगुला कपटी अंग तासों तो कौआ भला तन मन एकही रंग  


अर्थ :- बगुले का शरीर तो उज्जवल है पर मन काला कपट से भरा है उससे तो कौआ भला है जिसका                      तन मन एक जैसा है और वह किसी को छलता भी नहीं है






46.
रात गंवाई सोय कर दिवस गंवायो खाय  
हीरा जनम अमोल था कौड़ी बदले जाय


अर्थ :- रात सो कर बिता दी, दिन खाकर बिता दिया हीरे के समान कीमती जीवन को संसार के निर्मूल्य                          विषयों की कामनाओं और वासनाओं की भेंट चढ़ा दिया इससे दुखद क्या हो सकता है ?


                                                                         47


जाति पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।


अर्थ :- सज्जन की जाति पूछ कर उसके ज्ञान को समझना चाहिए। तलवार का मूल्य होता है कि उसकी                  मयान का उसे ढकने वाले खोल का। Kabir Das








48.
जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।


अर्थ :- जो प्रयत्न करते हैं, वे कुछ कुछ वैसे ही पा ही लेते हैं जैसे कोई मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ ले कर आता है। लेकिन कुछ बेचारे लोग ऐसे भी होते हैं जो डूबने के भय                    से  किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं और कुछ नहीं पाते।

49.
कबीर नाव जर्जरी कूड़े खेवनहार
हलके हलके तिरि गए बूड़े तिनि सर भार !

अर्थ :- कबीर कहते हैं कि जीवन की नौका टूटी फूटी है जर्जर है उसे खेने वाले मूर्ख हैं जिनके सर पर ( विषय वासनाओं ) का बोझ है वे तो संसार सागर में डूब जाते हैं संसारी हो कर रह जाते हैं दुनिया के धंधों से उबर नहीं पाते उसी में उलझ कर रह जाते हैं पर जो इनसे मुक्त हैं हलके हैं वे तर जाते हैं पार लग जाते हैं भव सागर में डूबने से बच जाते हैं



50.
मन जाणे सब बात जांणत ही औगुन करै
काहे की कुसलात कर दीपक कूंवै पड़े

अर्थ :- मन सब बातों को जानता है जानता हुआ भी अवगुणों में फंस जाता है जो दीपक हाथ में पकडे हुए भी कुंए में गिर पड़े उसकी कुशल कैसी?








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